लॉ विभाग में सीटें बढ़ाने की पैरवी

सागर। केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रवेश की दौड़, अवसरों की प्रतिस्पर्धा और स्थानीय युवाओं की उम्मीदों के बीच अब एक ऐसा सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिसका जवाब केवल दाखिले के आंकड़ों में नहीं, बल्कि शिक्षा के अवसरों की उपलब्धता में भी तलाशना होगा.

सवाल यह है कि सागर में स्थित देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई करने का सपना देखने वाले स्थानीय विद्यार्थियों को क्या पर्याप्त अवसर मिल पा रहे हैं?

इसी सवाल को लेकर जिला अधिवक्ता संघ, सागर ने डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति के समक्ष स्थानीय विद्यार्थियों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण और विधि विभाग में सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग रखी है। संघ की यह पहल महज प्रवेश प्रक्रिया से जुड़ी मांग नहीं, बल्कि स्थानीय प्रतिभाओं को उच्च शिक्षा में अवसर उपलब्ध कराने की पैरवी के रूप में भी देखी जा रही है।

सीटें सीमित, सपने बड़े—स्थानीय युवाओं के हिस्से में कितने अवसर?

कानून की पढ़ाई आज केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं है। यह न्याय व्यवस्था, प्रशासन, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक बदलाव से जुड़ा एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में विधि विभाग में सीटें बढ़ाने की मांग सीधे तौर पर उन विद्यार्थियों की आकांक्षाओं से जुड़ती है, जो कानून के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।

जिला अधिवक्ता संघ का मानना है कि सीटों में वृद्धि से अधिक विद्यार्थियों को प्रवेश का अवसर मिल सकता है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है—क्या विश्वविद्यालय में उपलब्ध सीटें स्थानीय विद्यार्थियों की मांग के अनुपात में पर्याप्त हैं? इसका उत्तर प्रवेश के आंकड़ों और विभाग की वास्तविक क्षमता के आकलन से ही सामने आ सकेगा।

25 प्रतिशत आरक्षण की मांग: स्थानीय अधिकार या नीतिगत चुनौती?

अधिवक्ता संघ ने स्थानीय विद्यार्थियों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण की मांग उठाकर बहस को एक नए मोड़ पर ला दिया है। यह मांग स्थानीय युवाओं को अवसर देने की भावना से प्रेरित है, लेकिन इसे लागू करना विश्वविद्यालय के मौजूदा प्रवेश नियमों, लागू आरक्षण व्यवस्था और संबंधित नीतियों के अनुरूप ही संभव होगा।

यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। मांग उठना एक शुरुआत है, लेकिन उसका नीतिगत समाधान तलाशना अगला और अधिक कठिन कदम। विश्वविद्यालय प्रशासन इस मांग पर क्या रुख अपनाता है, क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था संभव है और क्या सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव व्यावहारिक है—इन सवालों पर आगे की स्थिति स्पष्ट होनी बाकी है।

अधिवक्ताओं के बच्चों का मुद्दा भी उठा

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, संघ ने उन अधिवक्ताओं के बच्चों का विषय भी उठाया, जो प्रवेश के अवसर से वंचित रह जाते हैं। इसके पीछे स्थानीय विद्यार्थियों और अधिवक्ता परिवारों की शैक्षणिक आकांक्षाओं को सामने लाने की कोशिश दिखाई देती है।

हालांकि, किसी विशेष वर्ग को प्रवेश में अतिरिक्त लाभ देने की व्यवस्था भी निर्धारित नियमों के अधीन ही हो सकती है। इसलिए इस मांग पर विश्वविद्यालय का आधिकारिक पक्ष और लागू प्रवेश नीति महत्वपूर्ण होंगे।

कुलपति से मुलाकात के बाद अब निगाहें फैसले पर

13 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, जिला अधिवक्ता संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष डॉ. अंकलेश्वर दुबे और सचिव जितेंद्र लखन राठौर सहित पदाधिकारियों ने कुलपति से सौजन्य भेंट की। इसी दौरान लॉ विभाग में सीटें बढ़ाने और स्थानीय विद्यार्थियों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण की मांग रखी गई।

विज्ञप्ति में कुलपति की ओर से इन विषयों पर सार्थक प्रयास किए जाने का आश्वासन मिलने की बात कही गई है। हालांकि, इसे आरक्षण लागू होने या सीटें बढ़ाने के आधिकारिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिलहाल यह मांग और उस पर सकारात्मक पहल की उम्मीद है; अंतिम स्थिति विश्वविद्यालय के आधिकारिक निर्णय से ही स्पष्ट होगी।

अब असली परीक्षा विश्वविद्यालय प्रशासन की

सागर के स्थानीय विद्यार्थियों के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी शहर में विश्वविद्यालय की मौजूदगी और उस शहर के विद्यार्थियों को वहां पढ़ने के पर्याप्त अवसर मिलना—दो अलग-अलग बातें हैं। यदि प्रवेश क्षमता बढ़ाने की गुंजाइश है, तो उसका मूल्यांकन होना चाहिए। यदि स्थानीय विद्यार्थियों की समस्याएं सामने आ रही हैं, तो उनके समाधान पर तथ्य आधारित चर्चा भी जरूरी है।

लेकिन किसी भी व्यवस्था में स्थानीय हितों को आगे बढ़ाने के साथ समान अवसर, प्रवेश की पारदर्शिता और लागू नियमों का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

फिलहाल अधिवक्ता संघ ने सवाल उठा दिया है। अब देखना यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मांग को केवल एक प्रतिनिधिमंडल की अपील मानता है या स्थानीय विद्यार्थियों के शैक्षणिक अवसरों पर व्यापक विचार-विमर्श की शुरुआत करता है।


क्योंकि सवाल सिर्फ 25 प्रतिशत आरक्षण का नहीं है—सवाल यह भी है कि सागर के युवाओं के सपनों और अवसरों के बीच की दूरी कितनी कम हो सकती है।