खराब पानी में खोजा भविष्य का समाधान

बूंदों से राष्ट्रीय मंच तक: सागर की दो छात्राओं ने विज्ञान में गाड़ा सफलता का झंडा

सागर। विज्ञान की सार्थकता केवल प्रयोगशालाओं और किताबों तक सीमित नहीं होती, बल्कि तब सामने आती है जब विद्यार्थी रोजमर्रा की किसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं। सागर के केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-4 की दो छात्राओं ने इसी सोच के साथ राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस 2026-27 के जूनियर वर्ग में सहभागिता के लिए चयनित होकर विद्यालय और जबलपुर संभाग का नाम रोशन किया है।

केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-4 में कक्षा सातवीं की छात्राएं गीतांशी शर्मा और राहिनी शंकर ने अपने विज्ञान प्रोजेक्ट के माध्यम से जल संरक्षण और पर्यावरणीय जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण विषय को उठाया है। दोनों छात्राओं का चयन राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस के जूनियर वर्ग के लिए हुआ है।

राष्ट्रीय स्तर का आयोजन पीएम श्री केंद्रीय विद्यालय, तिसमलमारी, सिकंदराबाद में होना प्रस्तावित बताया गया है।

पानी को बेकार समझें या संसाधन मानें?

छात्राओं की परियोजना का विषय है— सतत गैर-पेय बागवानी सिंचाई हेतु ग्रे-वॉटर संग्रहण, विसंक्रमण एवं निगरानी प्रणाली।

इस विषय का महत्व समझने के लिए रोजमर्रा की एक सामान्य गतिविधि पर गौर करना होगा। हाथ धोने के बाद नल से निकलने वाला पानी अक्सर नाली में बह जाता है। लेकिन क्या इस पानी का उपचार करके दोबारा किसी उपयोग में लाया जा सकता है? छात्राओं का प्रोजेक्ट इसी सवाल का वैज्ञानिक समाधान तलाशता है।

परियोजना में कम लागत वाली निस्यंदन प्रणाली विकसित कर पानी को छानने और उसका उपयोग विद्यालय के उद्यान में सिंचाई के लिए करने की अवधारणा प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य हाथ धोने के बाद निकलने वाले अपेक्षाकृत कम प्रदूषित जल का पुनः उपयोग करना और पानी की बर्बादी को कम करने की दिशा में काम करना है।

यहां महत्वपूर्ण बात केवल पानी बचाने की नहीं, बल्कि संसाधनों के प्रति नजरिया बदलने की है। जिस पानी को सामान्यतः अपशिष्ट मानकर छोड़ दिया जाता है, उसका उचित उपचार और सुरक्षित उपयोग उसे उपयोगी संसाधन बना सकता है।

नवाचार की असली कसौटी: कम लागत और व्यावहारिक उपयोग

किसी भी वैज्ञानिक परियोजना की सफलता केवल उसके विचार से तय नहीं होती। उसकी उपयोगिता, लागत, प्रभावशीलता और वास्तविक परिस्थितियों में काम करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

छात्राओं के प्रोजेक्ट में कम लागत वाली निस्यंदन प्रणाली, जल के पुनः उपयोग और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है। यदि इस तरह की प्रणाली परीक्षण के बाद प्रभावी साबित होती है, तो विद्यालयों के बगीचों और अन्य गैर-पेय उपयोगों में पानी की खपत कम करने की संभावनाएं बन सकती हैं।

हालांकि, निस्यंदन और विसंक्रमण को एक ही प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। पानी को छान लेने मात्र से वह हर प्रकार के उपयोग के लिए सुरक्षित नहीं हो जाता। इसलिए वास्तविक प्रभावशीलता जानने के लिए पानी की गुणवत्ता, उपचार की क्षमता और नियमित निगरानी का वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक होगा।

यही वह बिंदु है जहां एक छात्र परियोजना केवल प्रतियोगिता का विषय न रहकर व्यावहारिक विज्ञान की कसौटी पर परखी जाने वाली पहल बन जाती है।

शिक्षिका के मार्गदर्शन में तैयार हुई परियोजना

विद्यालय की विज्ञान शिक्षिका सुश्री दीपा गुप्ता के मार्गदर्शन में छात्राओं ने परियोजना पर काम किया। विद्यालय के अनुसार, इस दौरान छात्राओं ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रयोगात्मक कौशल और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी समझ का परिचय दिया।

विद्यालय के प्राचार्य आर. एस. वर्मा ने छात्राओं की उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी और राष्ट्रीय स्तर पर आगामी सहभागिता के लिए शुभकामनाएं दीं।

उपलब्धि के आगे भी हैं कुछ बड़े सवाल

राष्ट्रीय स्तर पर चयन किसी भी विद्यार्थी के लिए उत्साह बढ़ाने वाला पड़ाव है। लेकिन इस उपलब्धि का व्यापक महत्व तब और बढ़ेगा, जब परियोजना के निष्कर्षों को व्यावहारिक रूप से परखा जाए और उपयोगी पाए जाने पर उन्हें दूसरे विद्यालयों तक पहुंचाने की संभावनाएं तलाश की जाएं।

क्या यह मॉडल कम लागत में तैयार हो सकता है? कितना पानी बचा सकता है? उपचार के बाद पानी की गुणवत्ता कैसी रहती है? और क्या इसका नियमित रखरखाव आसान है? ऐसे सवाल परियोजना की वास्तविक उपयोगिता को सामने लाएंगे।

सागर की इन छात्राओं की पहल का संदेश स्पष्ट है—विज्ञान केवल बड़ी खोजों का नाम नहीं, बल्कि आसपास मौजूद छोटी समस्याओं को समझकर उनका बेहतर समाधान खोजने की प्रक्रिया भी है। अब राष्ट्रीय मंच पर उनकी सहभागिता इस सोच को आगे बढ़ाने का अवसर बनेगी।