दवा के लिए भी पैसा नहीं? विकास के दावों के बीच स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल
सागर। मध्यप्रदेश में विकास और व्यवस्थाओं को लेकर सरकार के दावे लगातार सामने आते हैं, लेकिन सागर से सामने आया दवा बजट का आंकड़ा उन दावों के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने आरोप लगाया है कि सागर जिला चिकित्सालय का तीन माह का दवा बजट, जो पहले लगभग 20 लाख रुपये था, घटाकर महज 2 लाख रुपये कर दिया गया है। यानी औसतन करीब 66 हजार रुपये प्रतिमाह और लगभग 2,200 रुपये प्रतिदिन।
अब जरा इस आंकड़े को जमीन पर रखकर देखिए।
जिस जिले की आबादी करीब 20 लाख और शहर की आबादी तीन लाख से अधिक है, वहां सरकारी अस्पताल की दवाओं के लिए प्रतिदिन लगभग 2,200 रुपये का प्रावधान कितना पर्याप्त है—यह सवाल सिर्फ बजट का नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकता का सवाल है।
रघु ठाकुर का कहना है कि इस हिसाब से शहर की आबादी को देखें तो प्रति व्यक्ति दवा पर एक पैसे से भी कम राशि बैठती है।
और यहीं से असली सवाल शुरू होता है…
बरसात का मौसम है। वायरल, बुखार, पेट संबंधी संक्रमण, खांसी और सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीज बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में यदि सरकारी अस्पताल में दवाओं की उपलब्धता ही संकट में हो, तो गरीब और मध्यमवर्गीय मरीज आखिर जाएं कहां?
बताया जा रहा है कि हार्ट और शुगर जैसी नियमित रूप से आवश्यक दवाओं की उपलब्धता को लेकर भी परेशानी सामने आ रही है।
यह स्थिति केवल अस्पताल की समस्या नहीं है।
यह सवाल है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है?
एक तरफ विकास के बड़े-बड़े दावे, योजनाओं और निर्माण कार्यों पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करने की तस्वीर दिखाई जाती है, दूसरी तरफ यदि सरकारी अस्पताल में मरीज को अपनी जरूरी दवा बाहर से खरीदनी पड़े, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बुनियादी उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
इलाज का अधिकार सिर्फ भाषणों में नहीं, अस्पताल की खिड़की पर दिखना चाहिए।
सरकार का दायित्व सिर्फ सड़क, भवन और दूसरी परियोजनाएं बनाना नहीं है। स्वास्थ्य और चिकित्सा जैसी मूलभूत सेवाओं में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना भी शासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
रघु ठाकुर ने मुख्यमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि सरकारी धन को गैर-जरूरी मदों में खर्च करने के बजाय चिकित्सा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अब गेंद सरकार के पाले में है।
क्या सागर जिला चिकित्सालय के दवा बजट में वास्तव में इतनी बड़ी कटौती हुई है?
यदि हुई है, तो क्यों?
और यदि अस्पताल में जरूरी दवाओं की कमी है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
क्योंकि सवाल सिर्फ 2 लाख रुपये के बजट का नहीं है…
सवाल यह है कि जब मरीज अस्पताल इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचे, तो क्या उसके हाथ में दवा आएगी या फिर एक और पर्ची—“बाहर से खरीद लीजिए”—थमा दी जाएगी?
विकास की असली परीक्षा बड़े-बड़े आंकड़ों में नहीं, अस्पताल की दवा की खिड़की पर होती है।












