“लू में चल रहे ‘स्कूली क्रूज’ सागर बना बरगी डेम!”
सागर।
“सागर अब बरगी डेम बन गया है, जहां लू के बीच स्कूली क्रूज चल रहे हैं!” — शहर में इन दिनों यही तंज सबसे ज्यादा सुनाई दे रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां पानी नहीं, बल्कि तपती गर्मी की लहरें बह रही हैं… और उन पर सवार हैं नन्हें स्कूली बच्चे।
कुछ दिन पहले तक जिला प्रशासन को गर्मी इतनी खतरनाक लगी कि आदेशों की बाढ़ आ गई—
कभी नर्सरी से पांचवीं तक जल्दी छुट्टी, फिर अचानक अवकाश, और फिर आठवीं तक 30 जून तक छुट्टी का फरमान। लेकिन जैसे ही कैलेंडर ने करवट बदली, फैसलों ने भी यू-टर्न ले लिया।
अब वही स्कूल पूरे समय के साथ खुल रहे हैं और छुट्टी दोपहर करीब डेढ़ बजे—यानी जब सूरज अपने “पीक परफॉर्मेंस” में होता है।
लगता है सागर में मौसम नहीं, आदेश बदलते हैं।
बच्चे सुबह स्कूल जाते वक्त तो किसी तरह निकल जाते हैं, लेकिन वापसी में हालत ऐसी हो जाती है जैसे किसी ने उन्हें सीधे तंदूर से निकाल दिया हो। अभिभावक परेशान, शिक्षक बेबस और बच्चे इस “हीट वेव एक्सप्रेस” के मजबूर यात्री बन चुके हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब गर्मी बढ़ रही है, तो राहत क्यों घट रही है?
क्या प्रशासन को अब लू का असर महसूस नहीं हो रहा,
या फिर फाइलों में ही “ठंडी हवा” चल रही है?
शहर में चर्चा है कि—
“यहां मौसम विभाग नहीं, आदेश विभाग काम कर रहा है… जहां तापमान नहीं, निर्णय ऊपर-नीचे होते हैं।”
व्यंग्य अपनी जगह, लेकिन खतरा साफ दिख रहा है।
हीट वेव के बीच बच्चों का इस तरह सफर करना किसी जोखिम से कम नहीं।
अगर यही हाल रहा, तो सागर का यह ‘स्कूली क्रूज’ कभी भी ‘इमरजेंसी बोट’ में बदल सकता है… और तब शायद आदेश फिर से तेज़ी से बहने लगें।
















