डेयरी शिफ्टिंग पर निगम का अल्टीमेटम: 23 को कार्रवाई की चेतावनी, 53 को अब भी भूखंडों का इंतजार!
सागर में डेयरी संचालकों की मनमानी पर नगर निगम सख्त भूखंड मिला, फिर भी नहीं छोड़ा शहर! अब जुर्माना, FIR और विस्थापन की तैयारी।
सागर। शहर को स्वच्छ और व्यवस्थित बनाने के लिए डेयरियों को शहर से बाहर बसाने की योजना पर अब नगर निगम ने सख्ती का रुख अपना लिया है। हफसिली/रतौना में भूखंड आवंटित होने के बावजूद 23 डेयरी संचालकों ने अब तक अपनी डेयरियां निर्धारित स्थल पर शिफ्ट नहीं की हैं। नगर निगम आयुक्त राजकुमार खत्री ने ऐसे संचालकों के खिलाफ जुर्माना लगाने, एफआईआर दर्ज कराने और डेयरियों को शहर से बाहर विस्थापित करने की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
मामला सिर्फ डेयरियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का नहीं, बल्कि शहर की स्वच्छता, नागरिकों के स्वास्थ्य, यातायात और सार्वजनिक सुरक्षा का भी है। सवाल यह है कि जब डेयरी विस्थापन के लिए भूखंड आवंटित हो चुके हैं, तो फिर शहर के भीतर डेयरियां चलाने की मजबूरी आखिर क्या है?
▪️भूखंड मिला, फिर भी शिफ्टिंग से परहेज क्यों?
नगर निगम की जांच और भौतिक सत्यापन में पांच या उससे अधिक पशुओं वाली कुल 76 डेयरियां सामने आई हैं। इनमें 23 संचालकों को विस्थापन स्थल पर भूखंड आवंटित किए जा चुके हैं, लेकिन उन्होंने न शेड बनाया और न ही पशुओं को निर्धारित स्थल पर पहुंचाया।
यहीं से सवाल खड़ा होता है—क्या कुछ संचालकों के लिए नियम केवल दूसरों पर लागू होने वाली व्यवस्था हैं? जब शहर की सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर डेयरियों के संचालन से स्वच्छता और यातायात संबंधी समस्याएं पैदा होने की आशंका है, तो फिर विस्थापन की शर्तों का पालन करने में देरी क्यों?
भूखंड आवंटन कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि डेयरी को निर्धारित स्थान पर ले जाने की दिशा में अगला कदम है। अगर आवंटन के बाद भी शिफ्टिंग नहीं होती, तो पूरी योजना का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।
▪️शहर की असुविधा या संचालकों की सुविधा?
डेयरी संचालकों के लिए शहर के भीतर कारोबार सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन शहर के दूसरे नागरिकों के लिए वही व्यवस्था परेशानी का कारण बनती है तो इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। स्वच्छता का बोझ नागरिक उठाएं, अव्यवस्था का सामना राहगीर करें और विस्थापन की योजना कागजों में उलझी रहे—ऐसी व्यवस्था आखिर कब तक चलेगी?
हालांकि, प्रत्येक डेयरी संचालक की स्थिति अलग हो सकती है और कार्रवाई तथ्यों, आवंटन की शर्तों तथा लागू नियमों के आधार पर ही होनी चाहिए। लेकिन जहां भूखंड आवंटित होने के बाद भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, वहां नगर निगम की जवाबदेही है कि वह स्पष्ट समयसीमा तय करे और नियमों के अनुसार कार्रवाई करे।
▪️53 संचालकों को भूखंड नहीं, तो कार्रवाई का पैमाना क्या होगा?
इस पूरे मामले का दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जांच में सामने आईं 76 डेयरियों में से 53 संचालकों को अभी तक भूखंड आवंटित नहीं हुए हैं। नगर निगम ने इनके लिए शीघ्र शिविर लगाकर भूखंड आवंटित करने की बात कही है।
ऐसे में निगम के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—जिन्हें भूखंड मिल चुके हैं, उनसे शिफ्टिंग सुनिश्चित कराना और जिन्हें भूखंड नहीं मिले, उनके लिए आवंटन प्रक्रिया समय पर पूरी करना। प्रशासनिक देरी का खामियाजा उन संचालकों पर नहीं थोपा जाना चाहिए जिन्हें अब तक निर्धारित स्थल ही उपलब्ध नहीं कराया गया है।
▪️अब बात चेतावनी से आगे बढ़ेगी?
निगमायुक्त ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और नगरपालिक निगम अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। इनमें नियमानुसार जुर्माना, पुलिस में एफआईआर और डेयरियों को निर्धारित स्थल पर स्थानांतरित कराने की कार्रवाई शामिल है। हालांकि, कौन-सी कार्रवाई किस संचालक पर लागू होगी, यह संबंधित तथ्यों और विधिक प्रावधानों के आधार पर तय होगा।
अब असली परीक्षा नगर निगम की भी है। क्या निर्देश केवल चेतावनी बनकर रह जाएंगे या वास्तव में शहर के भीतर संचालित डेयरियों को व्यवस्थित तरीके से विस्थापित किया जाएगा? साथ ही, क्या 53 लंबित भूखंडों का आवंटन भी तय समयसीमा में पूरा होगा?
क्योंकि शहर किसी एक की सुविधा से नहीं, सबकी सहूलियत और नियमों के पालन से चलता है।
डेयरी संचालकों को भी यह समझना होगा कि भूखंड मिलने के बाद शिफ्टिंग टालना स्थायी समाधान नहीं है। और नगर निगम को भी यह साबित करना होगा कि उसके नियम केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर भी लागू होते हैं।
















