जन्माष्टमी पर सागर में खुशियों का विराट संगम
“उठो मोरे कन्हैया… हो गए भिनसारे…”
इन सुरों में सिर्फ भक्ति नहीं है…इनमें उस सुबह की मिठास है, जब मां यशोदा अपने कन्हैया को जगाती हैं… लेकिन सागर में यही बुंदेली सुर जब मातेश्वरी निवास पर गूंजे, तो लगा जैसे जन्माष्टमी के उत्सव ने दस्तक दे दी हो।
भजन मंडली पहुंची थी प्रदेश के कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह राजपूत से मिलने… और संयोग देखिए—जिस पर्व पर देश-दुनिया गोविंद यानी श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाती है, उसी दिन सागर के अपने गोविंद सिंह राजपूत का जन्मदिन भी आता है। यही वजह है कि सागर के लिए जन्माष्टमी की तारीख हर साल कुछ ज्यादा ही खास हो जाती है।
एक ओर नंद के घर आनंद…दूसरी ओर गोविंद के जन्मदिन का उल्लास…कान्हा के जन्म की खुशी में डूबता शहर…
और उसी खुशी के बीच अपने नेता के जन्मदिन की बधाइयों से सजता सागर।
यह सिलसिला नया नहीं है।
गोविंद सिंह राजपूत हर साल जन्माष्टमी के दिन अपना जन्मोत्सव मनाते हैं।
लेकिन इस बार भी तैयारियों की हलचल ने माहौल को खास बना दिया है।
शहर में बैनर और पोस्टर दिखाई देने लगे हैं…
जन्मदिन की रूपरेखा सामने आने लगी है…
और दिनभर के कार्यक्रमों का सिलसिला भी तय है।
सुबह अपने निज निवास पर पूजा-अर्चना और गौसेवा…
फिर भगवान शिव का अभिषेक…
इसके बाद समर्थकों और शुभचिंतकों से मुलाकात, स्वागत और अभिनंदन।
दोपहर में जरूरतमंद बच्चों के साथ भोजन…
शाम को मटकी फोड़ प्रतियोगिता…
और फिर अलग-अलग स्थानों पर स्वागत और जन्मदिन की शुभकामनाओं का सिलसिला।
यानी जन्मदिन का एक दिन…
लेकिन खुशियों के कई रंग।
भक्ति का रंग…
सेवा का रंग…
अपनों से मिलने का रंग…
और उत्सव का रंग।
सुरखी से सागर तक इस दिन की अपनी ही तस्वीर होगी।
मंदिरों में शंख बजेंगे…
कहीं “राधे-राधे” की गूंज होगी…
कहीं नंदलाल के जयकारे होंगे…
और इसी उत्सवी माहौल में मंत्री “गोविंद सिंह राजपूत” के जन्मदिन की बधाइयां भी सुनाई देंगी।
शायद इसीलिए यह सिर्फ एक जन्मदिन की कहानी नहीं…
यह उस संयोग की कहानी है, जहां एक ही तारीख पर आस्था और अपनापन साथ खड़े दिखाई देते हैं।
कान्हा जन्मेंगे…
गोविंद का जन्मदिन आएगा…
और सागर दोनों खुशियों को अपने अंदाज में जीएगा।
जन्माष्टमी की पावन बेला में
भक्ति भी होगी… उल्लास भी होगा…
और खुशियों का वह विराट संगम भी,
जिसका सागर हर साल गवाह बनता है।
















