बंडा का जहर… एसपी पर सवाल क्यों ?

क्या पुलिस को हर शराब की बोतल पर पहरा देना था? अनुराग सुजानिया को हटाना कितना सही?

बंडा त्रासदी के बाद यह सवाल सिर्फ सागर की सड़कों से नहीं, बल्कि सत्ता और प्रशासन के गलियारों से भी उठ रहा है।

मौतों के बाद कार्रवाई जरूरी है। जवाबदेही भी जरूरी है।लेकिन जवाबदेही तय करने से पहले यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि किस विभाग की क्या जिम्मेदारी थी।

क्या पुलिस को जिले में बिकने वाली हर शराब की बोतल पर पहरा देना था? क्या हर दुकान के लाइसेंस, स्टॉक और बिक्री की निगरानी पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी थी?

या फिर इस व्यवस्था में आबकारी विभाग की भूमिका को भी उतनी ही कठोरता से जांचा जाना चाहिए? बंडा की त्रासदी ने यही बहस खड़ी कर दी है। मौतों का दर्द किसी तर्क से छोटा नहीं हो सकता । सबसे पहले उन परिवारों की बात होनी चाहिए, जिनके लिए बंडा अब कभी सामान्य नहीं होगा।

किसी ने बेटा खोया है। किसी ने पति। किसी ने भाई। और किसी परिवार ने अपना मुखिया।

उन घरों में अब राजनीतिक बयान नहीं गूंज रहे। वहां सन्नाटा है। वहां उस व्यक्ति की कमी है, जो सुबह घर से निकला था और फिर कभी लौटकर नहीं आया।

इसलिए इस त्रासदी में प्रशासनिक जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

लेकिन जिम्मेदारी का मतलब किसी एक विभाग या अधिकारी को बिना जांच के दोषी ठहरा देना नहीं है।

आबकारी विभाग से सबसे बड़ा सवाल

शराब का कारोबार सामान्य व्यापार नहीं है। यह लाइसेंस और नियमन के कड़े सरकारी ढांचे के अंतर्गत आता है। शराब की दुकानों की वैधता, लाइसेंस, स्टॉक, बिक्री और आबकारी कानून के उल्लंघन पर निगरानी में आबकारी विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका है।

तो बंडा में सबसे पहला सवाल यह भी होना चाहिए—

जब अवैध शराब का नेटवर्क चल रहा था, तब आबकारी की निगरानी व्यवस्था क्या कर रही थी?

अगर अवैध शराब इतनी आसानी से लोगों तक पहुंच गई कि उसके सेवन के बाद इतनी बड़ी त्रासदी सामने आ गई, तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि—

▪️अवैध शराब का स्रोत क्या था?

▪️सप्लाई किस रास्ते से हुई?

▪️स्थानीय स्तर पर इसकी बिक्री कितने समय से चल रही थी?

▪️क्या पहले कोई शिकायत या सूचना मिली थी?

▪️आबकारी अमले ने क्षेत्र में कितनी जांच की?

▪️क्या लाइसेंसी दुकानों और अवैध कारोबार के बीच कोई कड़ी थी?

इन सवालों के जवाब दोष तय करने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए जरूरी हैं।

पुलिस की भूमिका अलग है

पुलिस से सवाल नहीं होने चाहिए—ऐसा कहना भी गलत होगा। पुलिस की जिम्मेदारी है कि अपराध सामने आने के बाद FIR दर्ज हो, आरोपियों की गिरफ्तारी हो, आपराधिक नेटवर्क की जांच हो और पूरे मामले की तह तक पहुंचा जाए।

और बंडा में अब यही सबसे महत्वपूर्ण काम है।

जहर किसने बेचा, इससे आगे बढ़कर जहर आया कहां से—यह पता करना।

▪️किसने सप्लाई की?

▪️किसने पैसा लगाया?

▪️किसने वितरण किया?

▪️किस-किस गांव तक नेटवर्क फैला था?

यही वह जांच है जिसमें पुलिस की असली भूमिका सामने आएगी।

तो फिर अनुराग सुजानिया को हटाना कितना सही?

यही इस समय सबसे बड़ा सवाल है।

अगर किसी अधिकारी के खिलाफ जांच में ऐसी प्रत्यक्ष लापरवाही सामने आती है कि उसके रहते अपराधी नेटवर्क फलता-फूलता रहा, तो कार्रवाई होनी चाहिए।

पद किसी को जवाबदेही से ऊपर नहीं रख सकता।

लेकिन दूसरी तरफ एक दूसरा सवाल भी है—

अगर पुलिस की ओर से ऐसी कोई ठोस चूक अभी प्रमाणित नहीं हुई है, तो क्या सिर्फ त्रासदी घटने के आधार पर एसपी को बदल देना समस्या का समाधान होगा?

यहां शासन को बहुत सोच-समझकर फैसला लेना होगा।

क्योंकि एसपी बदलना आसान है… लेकिन अपराध का नेटवर्क समझना आसान नहीं।

एक नया अधिकारी आएगा तो उसे जिले के अपराधियों, स्थानीय सूचना तंत्र, पुलिसिंग व्यवस्था और इस मामले में अब तक सामने आए सुरागों को समझने में समय लगेगा।

वहीं मौजूदा पुलिस नेतृत्व के पास जांच की शुरुआती कड़ियां पहले से मौजूद हैं।

सुजानिया के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क—जांच का continuity

अगर मौजूदा एसपी को हटाया जाता है, तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “किसे हटाया?”

सवाल होना चाहिए—

“क्या इससे जांच मजबूत होगी?”

और अगर सुजानिया को बनाए रखा जाता है, तो उनसे भी सवाल होना चाहिए—

“क्या आप जहर की आखिरी मंजिल तक पहुंचेंगे?”

क्योंकि अब मामला सिर्फ कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी का नहीं है।

पूरे नेटवर्क की पहचान जरूरी है।

सागर पुलिस ने हाल के दिनों में बड़े आर्थिक और संगठित अपराधों से जुड़े मामलों में कार्रवाई की है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंडा मामले की जांच भी स्थानीय विक्रेता से आगे बढ़कर सप्लाई और वित्तीय नेटवर्क तक पहुंचती है या नहीं।

यही वह जगह है जहां शासन को पुलिस नेतृत्व को परिणाम देने का अवसर दिया जा सकता है। आबकारी पर सवाल और पुलिस पर सवाल—दोनों बराबर क्यों नहीं?

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।

अगर शराब अवैध तरीके से बिक रही थी, तो सवाल केवल यह नहीं कि पुलिस ने उसे पकड़ा क्यों नहीं।

सवाल यह भी है कि शराब के नियमन और अवैध कारोबार की निगरानी करने वाला आबकारी तंत्र क्या कर रहा था?

घटना के बाद आबकारी अधिकारियों पर कार्रवाई होना अपने आप में यह संकेत देता है कि शासन ने आबकारी स्तर पर भी गंभीरता दिखाई है।

लेकिन अब जरूरत है कार्रवाई से आगे जाकर जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर सामने लाने की।

कहीं ऐसा न हो कि—

बोतल किसी और की थी,

बिक्री किसी और की थी,

निगरानी किसी और की थी,

और पूरा दोष सिर्फ पुलिस के सिर रख दिया जाए।

यह निष्पक्ष विश्लेषण नहीं होगा।

दो उपमुख्यमंत्री पहुंचे, लेकिन सवाल वहीं हैं

त्रासदी के बाद उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और जगदीश देवड़ा का बंडा-सागर पहुंचना सरकार की गंभीरता को दिखाता है।

मरीजों से मिलना, परिवारों का दर्द सुनना और इलाज की व्यवस्था देखना जरूरी था।

लेकिन जनता का अगला सवाल स्वाभाविक है—

अब आगे क्या?

क्या सिर्फ निलंबन होंगे?

क्या सिर्फ गिरफ्तारियां होंगी?

या फिर वह पूरा तंत्र सामने आएगा जिसने इस जहर को गांवों तक पहुंचाया?

क्योंकि अगर जहर की जड़ नहीं मिली, तो कार्रवाई अधूरी मानी जाएगी।

शासन के लिए एक कठिन लेकिन जरूरी फैसला

इस वक्त शासन के सामने सबसे आसान रास्ता है—

कुछ अधिकारियों को हटाइए और संदेश दीजिए कि सरकार सख्त है। लेकिन इससे ज्यादा कठिन रास्ता है— पूरे सिस्टम की जांच कराइए और जहां जिसकी वास्तविक चूक मिले, वहीं जवाबदेही तय कीजिए।

यही ज्यादा टिकाऊ रास्ता है।

▪️अगर एसपी की गलती है—कार्रवाई हो।

▪️अगर आबकारी की चूक है—कार्रवाई हो।

अगर किसी अन्य स्तर पर लापरवाही है—वह भी सामने आए।

और अगर कोई निर्दोष है, तो सिर्फ इसलिए न हटाया जाए कि जनता को तत्काल किसी चेहरे पर कार्रवाई दिखाई दे।

बंडा को एक बलि का बकरा नहीं, पूरा सच चाहिए

बंडा की त्रासदी में अब सबसे जरूरी है कि जांच “किसने शराब बेची?” पर रुक न जाए।

उसे पूछना होगा—

“जहर आया कहां से?”

फिर—

“किसने पहुंचाया?”

और अंत में—

“इतनी बड़ी मात्रा में जहर लोगों तक पहुंचने तक निगरानी तंत्र कहां था?”

इन तीन सवालों के जवाब में ही बंडा की असली कहानी छिपी है।

और इसलिए सवाल फिर वही…

क्या पुलिस को हर शराब की बोतल पर पहरा देना था? नहीं।लेकिन पुलिस को अपराध के नेटवर्क पर नजर रखनी थी।

क्या आबकारी विभाग अकेला जिम्मेदार है?

ऐसा भी अभी कहना जल्दबाजी होगी।

लेकिन शराब के नियमन और अवैध शराब पर प्रवर्तन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, इसलिए आबकारी की जवाबदेही की जांच सबसे गंभीरता से होनी चाहिए।

और क्या अनुराग सुजानिया को हटाना ही समाधान है?

शायद इसका जवाब जांच के तथ्य देंगे।

लेकिन अगर शासन को भरोसा है कि मौजूदा पुलिस नेतृत्व इस नेटवर्क की तह तक पहुंच सकता है, तो उसे सिर्फ राजनीतिक दबाव या तत्काल धारणा के आधार पर फैसला लेने के बजाय जांच की continuity और परिणाम को भी देखना चाहिए।


फ्री हैंड किसी अधिकारी को बचाने के लिए नहीं… सच तक पहुंचने के लिए होना चाहिए। क्योंकि बंडा में लोगों ने सिर्फ अपने लोग नहीं खोए हैं। उन्होंने व्यवस्था पर भरोसा भी दांव पर लगाया है। अब उस भरोसे की कीमत किसी एक अधिकारी का तबादला नहीं… बल्कि उस जहर की जड़ तक पहुंचकर तय होनी चाहिए।


बंडा को जवाब चाहिए। पर जवाब किसी एक चेहरे से नहीं—पूरे सिस्टम से।