बुंदेली माटी का गौरव: सागर-छत्रसाल अखाड़े के उस्ताद भगवानदास रैकवार को पद्मश्री सम्मान
सागर।
बुंदेलखंड की पारंपरिक मार्शल आर्ट और अखाड़ा संस्कृति को जीवित रखने वाले सागर-छत्रसाल अखाड़े के उस्ताद, 83 वर्षीय भगवानदास रैकवार को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया है। यह सम्मान उन्हें बुंदेली मार्शल आर्ट को संरक्षित करने, उसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने और राष्ट्रीय पहचान दिलाने में दिए गए अतुलनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया है।
भगवानदास रैकवार केवल एक अखाड़े के उस्ताद नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की उस परंपरा के प्रहरी हैं, जिसने शौर्य, अनुशासन और आत्मरक्षा को जीवन का हिस्सा बनाया। दशकों तक उन्होंने सागर-छत्रसाल अखाड़े में युवाओं को निःस्वार्थ भाव से प्रशिक्षण दिया और अखाड़ा संस्कृति को जिंदा रखा, जब आधुनिकता के दौर में पारंपरिक कलाएं उपेक्षा का शिकार हो रही थीं।
अखाड़े से राष्ट्रीय सम्मान तक का सफर
भगवानदास रैकवार ने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा मिट्टी के अखाड़े, व्यायाम, दंड-बैठक, तलवार, लाठी और पारंपरिक बुंदेली युद्ध कलाओं को समर्पित किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी अपने संकल्प को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका मानना रहा कि “अखाड़ा केवल शरीर नहीं, चरित्र भी गढ़ता है।”
उनके प्रशिक्षण से निकले अनेक शिष्य आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुके हैं। कई शिष्य पुलिस, सेना और खेल जगत से जुड़े, तो कई ने अखाड़ा संस्कृति को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया।
कला और संस्कार की विरासत
भगवानदास रैकवार प्रसिद्ध रंगमंच एवं सिने कलाकार राजकुमार रैकवार के पिता हैं। जहां पिता ने अखाड़े और परंपरा को जीवित रखा, वहीं पुत्र ने अभिनय के माध्यम से कला और समाज को नई दृष्टि दी। यह परिवार बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है, जहां शारीरिक साधना और रचनात्मक अभिव्यक्ति साथ-साथ चलती हैं।
बुंदेलखंड के लिए गर्व का क्षण
पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद सागर सहित पूरे बुंदेलखंड में हर्ष और गर्व का माहौल है। स्थानीय नागरिकों, शिष्यों और सांस्कृतिक संगठनों ने इसे बुंदेली माटी का सम्मान बताया है। लोगों का कहना है कि यह पुरस्कार केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरी अखाड़ा परंपरा और लोक संस्कृति को मिला है।
83 वर्ष की उम्र में भी भगवानदास रैकवार का जीवन अनुशासन, सादगी और परंपरा के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उनका सम्मान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि जड़ों से जुड़कर ही पहचान बनाई जा सकती है।
















