दुआओं और आंसुओं के बीच मौलाना साहब की अंतिम विदाई

  • मौलाना मुतीऊर्रहमान साहब के आख़िरी सफ़र में उमड़ा हुजूम अपने-आप में बहुत कुछ कह जाता है।
जिस शख़्स को कंधा देने के लिए हजारों हाथ आगे बढ़े हों, उससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि वह इंसान कितना अज़ीज़, कितना मुक़द्दस और कितना मक़बूल था।

आज सागर की फिज़ाएं ग़मगीन हैं…

जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना मुतीऊर्रहमान साहब अपने रब की बारगाह में हाज़िर हो चुके हैं। उनका यह आख़िरी सफ़र, दरअसल जन्नत की ओर रुख़ करता हुआ सफ़र है।

चार दशकों तक दीन की खिदमत करने वाले मौलाना साहब ने अपनी पूरी दुनियावी ज़िंदगी पाकीज़गी, सादगी और इख़लास के साथ गुज़ारी। उनकी ज़िंदगी का हर लम्हा दीन से जुड़ा रहा…और हर दिल से जुड़ा रहा।

जुमे की नमाज़ हो या मुस्लिम त्यौहार, मौलाना साहब के बयान सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं होते थे, बल्कि वो लोगों को सही राह दिखाने वाली रोशनी होते थे। दुआओं में वो सिर्फ़ अपनी कौम के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की अमन-शांति के लिए अल्लाह के सामने हाथ फैलाते थे —और यह मंज़र हर शख़्स ने अपनी आंखों से देखा है।

जामा मस्जिद के पास जब कभी मौलाना साहब सुकून से बैठे दिखाई देते, तो हर कौम, हर मज़हब का शहरवासी उन्हें सलाम करने, उनका इस्तक़बाल करने से खुद को रोक नहीं पाता था। और मौलाना साहब भी मुस्कुराकर, अदब के साथ हर किसी के सलाम का जवाब देते थे। यही वजह है कि उनका आदर और सम्मान सिर्फ़ मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर समाज, हर वर्ग के दिलों में उनके लिए एक ख़ास जगह बनी रही।

अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दौर में खुदा ने उन्हें सख़्त बीमारी के जरिए आज़माइशों से गुज़ारा, और फिर उन्हें पाक-साफ़ करके अपने पास बुला लिया।

आज हर आंख नम है…हर दिल उदास है…और हर जुबान पर बस एक ही दुआ है —

अल्लाह तआला मौलाना मुतीऊर्रहमान साहब को जन्नतुल फ़िरदौस में आला तरीन मुक़ाम अता फरमाए, और उनके चाहने वालों को यह सदमा सहने की ताक़त दे। आमीन।