दो-दो डिप्टी CM पहुंचे… फिर भी सवाल बाकी क्यों?

मध्यप्रदेश में जहर का कहर: बंडा त्रासदी ने लिख दिया ऐसा अध्याय, जिसे अब लोग भूलेंगे नहीं.

सागर के बंडा में संदिग्ध जहरीली शराब से हुई मौतों ने सिर्फ कई परिवारों के चिराग नहीं बुझाए, बल्कि मध्यप्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने भी कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। मौतों का आंकड़ा 22 तक पहुंचने और 112 लोगों के अस्पताल में भर्ती होने की रिपोर्ट है। 14 आरोपियों की गिरफ्तारी और 30 लोगों पर FIR के बीच प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई का दौर जारी है।

बंडा…

अब यह सिर्फ सागर जिले का एक कस्बा नहीं रह गया।

बंडा अब एक ऐसी त्रासदी का नाम बन चुका है, जिसके साथ कई परिवारों का जीवन हमेशा के लिए बदल गया।

किसी ने बेटा खोया…किसी ने पति…किसी ने भाई…और किसी परिवार ने अपना कमाने वाला, अपना मुखिया।

सरकारी आंकड़ों में मौतें संख्या हो सकती हैं, लेकिन उन संख्याओं के पीछे जिन घरों की दुनिया उजड़ी है, उनके लिए यह कोई आंकड़ा नहीं। वह जिंदगी भर का खालीपन है। और शायद इसीलिए बंडा की यह कहानी बाकी खबरों की तरह जल्दी भुलाई नहीं जाएगी।

घटना के बाद पूरा प्रशासन कटघरे में त्रासदी सामने आई तो सरकार और प्रशासन सक्रिय हुए। वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे। मरीजों के इलाज की व्यवस्था देखी गई। दुकानें सील हुईं। सैंपल लिए गए। जांच के आदेश हुए।

लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है।

अगर अवैध शराब का नेटवर्क इतना सक्रिय था कि जहरीली शराब गांवों तक पहुंच गई, तो निगरानी तंत्र कहां था? और यही वह सवाल है, जिसे अब विपक्ष राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। क्योंकि घटना के बाद कार्रवाई दिखाई दे रही है—

लेकिन जनता यह भी पूछ सकती है कि घटना से पहले व्यवस्था कितनी जाग रही थी?

कार्रवाई की लंबी सूची… क्या यह जवाबदेही का संकेत है?

बंडा त्रासदी के बाद कार्रवाई केवल शराब बेचने वालों तक सीमित नहीं रही।

आबकारी विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। पुलिस अधिकारियों पर भी गाज गिरी। बंडा SDM आरती यादव को हटाकर सागर कलेक्ट्रेट पदस्थ किया गया और संजय कुमार जैन को बंडा SDM का प्रभार दिया गया।

बंडा थाना प्रभारी और गुगरा चौकी प्रभारी पर भी कार्रवाई की गई थी।

और अब सवाल यह नहीं है कि कितने अधिकारी हटाए गए।सवाल यह है—

क्या इतने अधिकारियों का हटना यह संकेत नहीं देता कि व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं गंभीर चूक हुई थी?

यही वह बिंदु है जहां बंडा की त्रासदी एक आपराधिक घटना से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाती है।

14 गिरफ्तारी… लेकिन असली सवाल अभी बाकी

उपलब्ध ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शराब ठेकेदार समेत 30 लोगों पर FIR दर्ज की गई है और 14 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

यह कार्रवाई जरूरी है।

लेकिन जनता शायद यह जानना चाहेगी—

जहर बनाने वाला कौन था?

सप्लाई किसने की?

कहां से आई?

किस नेटवर्क ने इसे गांवों तक पहुंचाया?

और सबसे अहम—क्या इस पूरे नेटवर्क को पहले से किसी स्तर पर संरक्षण या अनदेखी मिल रही थी?

इन सवालों के जवाब जांच से आने चाहिए।

बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

लेकिन सवाल पूछना भी लोकतंत्र में गलत नहीं है।

दो उपमुख्यमंत्री… और बंडा के सवाल

इस त्रासदी के बीच सरकार की तरफ से दो उपमुख्यमंत्रियों की सक्रियता भी दिखाई दी।

उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने BMC पहुंचकर मरीजों का हाल जाना और इलाज की समीक्षा की।

वहीं उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने भी अस्पताल पहुंचकर मरीजों और परिजनों से मुलाकात की तथा मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता की घोषणा की।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ज्यादा कड़वा है।

दो उपमुख्यमंत्री बंडा और सागर में व्यवस्था संभालते नजर आए…लेकिन सवाल यह है कि व्यवस्था को इस स्थिति तक पहुंचने ही क्यों दिया गया?

यही वह कटाक्ष है, जो इस पूरी त्रासदी को राजनीतिक बहस में बदल रहा है।

कांग्रेस को मिला सरकार को घेरने का मौका

विपक्ष के लिए इससे बड़ा मुद्दा शायद ही हो सकता है।

कांग्रेस अब पूछ रही है—गरीबों की जान जाने के बाद ही सरकार क्यों जागती है? यह सवाल राजनीतिक है, लेकिन इसके पीछे जनता की पीड़ा वास्तविक है।

सरकार के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष के सवालों का जवाब देना नहीं है।

सरकार के सामने चुनौती उन परिवारों के सवालों का जवाब देना है, जिन्होंने अपना अपना खोया है।

मध्यप्रदेश में जहर का कहर

बंडा को अगर व्यापक संदर्भ में देखें तो यह सिर्फ शराब का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जो यह तय करती है कि— कौन सी शराब बाजार में पहुंचेगी, कौन उसकी निगरानी करेगा, कौन अवैध बिक्री रोकेगा और चूक होने पर जवाबदेही किसकी होगी।

यही कारण है कि बंडा की त्रासदी अब सिर्फ सागर की खबर नहीं रही। यह मध्यप्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल बन चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल—क्या लोग भूल जाएंगे? राजनीतिक घटनाएं अक्सर कुछ दिनों की सुर्खियां बनती हैं। बयान आते हैं। जांच बैठती है। निलंबन होते हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। मुआवजे की घोषणा होती है।फिर खबरें बदल जाती हैं। लेकिन बंडा के उन घरों में खबर नहीं बदलेगी। वहां जिस कुर्सी पर पिता बैठते थे, वह खाली रहेगी। जिस फोन पर बेटे की आवाज आती थी, वह शायद फिर कभी नहीं बजेगा। जिस व्यक्ति को परिवार अपना सहारा मानता था, वह वापस नहीं आएगा। इसलिए समाज शायद आगे बढ़ जाए… राजनीति आगे बढ़ जाए… खबरें आगे बढ़ जाएं…लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए बंडा कभी पीछे नहीं छूटेगा।

सरकार के सामने अब असली परीक्षा

अब सिर्फ यह बताना काफी नहीं होगा कि कितने आरोपी पकड़े गए। सरकार को यह भी दिखाना होगा कि— ऐसी शराब दोबारा गांव तक न पहुंचे। अवैध शराब का नेटवर्क जड़ से खत्म हो। निगरानी व्यवस्था मजबूत हो।

और अगर किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदारी सिर्फ निलंबन तक सीमित न रहे—जांच में जो तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर जवाबदेही तय हो।

क्योंकि निलंबन प्रशासनिक कार्रवाई है…लेकिन न्याय उससे आगे की चीज है। और आखिर में…बंडा त्रासदी को सिर्फ “जहरीली शराब कांड” कहकर भूल जाना आसान होगा।

लेकिन इस घटना को एक चेतावनी की तरह देखना जरूरी है।क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि जहर किसने बेचा? सवाल यह भी है—

जहर वहां तक पहुंचने से पहले कितने दरवाजों से गुजरा? और उन दरवाजों पर पहरा किसका था? मध्यप्रदेश में जहर का यह कहर कई परिवारों की जिंदगी उजाड़ चुका है। अब सरकार के सामने चुनौती है—

इस त्रासदी को एक खबर बनाकर खत्म करना है… या इसे ऐसी व्यवस्था सुधार की शुरुआत बनाना है, ताकि अगला बंडा कभी न हो। क्योंकि मौत के बाद की कार्रवाई जरूरी है लेकिन मौत से पहले की सतर्कता—उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।